Best Shayari of Mirza Ghalib in Hindi 2 lines & 1 Lines

  • Mirza Ghalib (Mirza Asadullah Beg Khan) was the great and finest poet and shayar in Mughal Era of India ,as born in on 27 December 1797 in Agra (Uttar Pradesh). He has written thousands of shayari , sher or poems on love and affection. Here we are presenting Best shayari of Mirza Ghalib in hindi. 

    Shayari of Mirza Ghalib

     

    मत पूँछ की क्या हाल हैं मेरा तेरे पीछे ,
    तू देख की क्या रंग हैं तेरा मेरे आगे …

    ऐ बुरे वक़्त ज़रा अदब से पेश आ ,
    क्यूंकि वक़्त नहीं लगता वक़्त बदलने में …

    ज़िन्दगी उसकी जिस की मौत पे ज़माना अफ़सोस करे ग़ालिब ,
    यूँ तो हर शक्श आता हैं इस दुनिया में मरने कि लिए …

    ज़ाहिद शराब पीने दे मस्जिद में बैठ कर ,
    या वह जगह बता जहाँ खुदा नहीं ..

    था ज़िन्दगी में मर्ग का खत्का लाग हुआ ,
    उड़ने से पेश -तर भी मेरा रंग ज़र्द था .

     

    क़ैद-ए-हयात-ओ-बंद-ए-ग़म,
    अस्ल में दोनों एक हैंमौत से पहले आदमी ग़म से निजात पाए क्यूँ?

    इस सादगी पर कौन ना मर जाये
    लड़ते है और हाथ में तलवार भी नहीं

    उनके देखे जो आ जाती है रौनक
    वो समझते है कि बीमार का हाल अच्छा है

    जला है जिस्म जहाँ दिल भी जल गया होगा,
    कुरेदते हो जो अब राख, जुस्तजू क्या है ?

    हथून कीय लकीरून पय मैट जा ऐ ग़ालिब,
    नसीब उनके भी होते हैं जिनके हाथ नहीं होते …

    उनकी देखंय सी जो आ जाती है मुंह पर रौनक,
    वह समझती हैं केह बीमार का हाल अच्छा है…!!!

    दिल सी तेरी निगाह जिगर तक उतर गई,
    2नो को एक अड्डा में रज़्ज़ा मांड क्र गए …!!!

    कितना खौफ होता है शाम के अंधेरूँ में,
    पूँछ उन परिंदों से जिन के घर्र नहीं होते …

     

    हज़ारों ख्वाहिशें ऐसी के हर ख्वाहिश पे दम निकले
    बहुत निकले मीरे अरमान लेकिन फिर भी कम निकले

    रेख्ते के तुम्हें उस्ताद नहीं हो ग़ालिब
    कहते हैं अगले ज़माने में कोई मीर भी था

    फिर उसी बेवफा पे मरते हैं
    फिर वही ज़िन्दगी हमारी है

    मासूम मोहब्बत का बस इतना फ़साना है
    कागज़ की हवेली है बारिश का ज़माना है

    उस पर उतरने की उम्मीद बोहत कम है
    कश्ती भी पुरानी है और तूफ़ान को भी आना है

    यह इश्क़ नहीं आसान बस इतना समझ लीजिये
    एक आग का दरया है और डूब कर जाना है

     

    कोई उम्मीद बर नहीं आती
    कोई सूरत नज़र नहीं आती

    मौत का एक दिन मु’अय्यन है
    निहद क्यों रात भर नहीः आती?

    आगे आती थी हाल-इ-दिल पे हंसी
    अब किसी बात पर नहीं आती

    क्यों न चीखूँ की याद करते हैं
    मेरी आवाज़ गर नहीं आती.

    हम वहाँ हैं जहां से हमको भी
    कुछ हमारी खबर नहीं आती

     

     

    Mirza Ghalib in Hindi 1 lines

    जिस दिल पे नाज़ था मुझे वह दिल नहीं रहा

     

     

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