Me Hu Ek Aam Aadmi Special Poem 4 Common Man

Today a common man does not have a value in society and face problem on every step.

Here, Poet is describing the situation of a common man in life through his poem “Me Hu Ek Aam Aadmi Special Poem 4 Common Man“.


जब भी कोई मुझसे पूछता है
कि कौन हो तुम ?
तो मैं कहता हूँ की आम आदमी !

रोज़ी रोटी की फ़िराक़ मेँ फिरता हूँ मारा मारा
कोई कहता है आवारा तो कोई बेचारा

लेकिन फिर भी नहीं रुकता मेँ
क्योंकि पेट भरना तो है लाजमी,
मैं हूँ आम आदमी . .

जब भी कोई मुझसे पूछता है
कि कौन हो तुम ?
तो मैं कहता हूँ की आम आदमी !

जो इस देश की सत्ता मेँ भागीदर है
कहने को उसके पास 6 मौलिक अधिकार है
फिर भी यूँ घुट घुट कर जीने को लाचार है
कदम कदम पर सहता कितने अत्याचार है

क्योंकि जिन्दा रहना तो है लाज़मी
मैं हूँ आम आदमी . .

जब भी कोई मुझसे पूछता है
कि कौन हो तुम ?
तो मैं कहता हूँ की आम आदमी !


Written By: Hari Shankar

2 Comments

  1. BingBytes October 31, 2016
  2. GadgetsP October 31, 2016

Add Comment