Mirza Ghalib Shayari in Hindi & Ghalib Shayari Collection

Mirza Ghalib(Mirza Asadullah Khan Ghalib), the Urdu and Persian poet during the last years of the Mughal Empire.He used his pen-names of Ghalib. Here we are sharing “Mirza Ghalib Shayari in Hindi

 

Mirza Ghalib Shayari in Hindi

इश्क से तबियत ने जीस्त का मजा पाया,
दर्द की दवा पाई दर्द बे-दवा पाया।

ALso Read:

आता है दाग-ए-हसरत-ए-दिल का शुमार याद,
मुझसे मेरे गुनाह का हिसाब ऐ खुदा न माँग।

आया है बे-कसी-ए-इश्क पे रोना ग़ालिब,
किसके घर जायेगा सैलाब-ए-बला मेरे बाद।

आशिकी सब्र तलब और तमन्ना बेताब,
दिल का क्या रंग करूँ खून-ए-जिगर होने तक।

कितना खौफ होता हैं शाम के अंधेरों में ,
पूछ उन परिंदो से जिनके घर नहीं होते. . .!

कितना दूर निकल गए रिश्ते निभाते निभाते ,
खुद को खो दिया हमने अपनों को पाते पाते ,

लोग कहते है दर्द है मेरे दिल में ,
और हम थक गए मुस्कुराते मुस्कुराते

हम ने मोहबतों कि नशे में आ कर उसे खुद बना डाला ,
होश तब आया जब उसने कहा कि खुद किसी एक का नहीं होता .

अभी मशरूफ हूँ काफी , कभी फुर्सत में सोचूंगा ,
के तुझको याद रखने में मैं क्या क्या भूल जाता हूँ .

न सोचा मैंने आगे, क्या होगा मेरा हशर,
तुझसे बिछड़ने का था, मातम जैसा मंज़र!

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Mirza Ghalib Shayari in Hindi 2 lines

 

दिल-ए-नादाँ तुझे हुआ क्या है
आख़िर इस दर्द की दवा क्या है

 

हम को उन से वफ़ा की है उम्मीद
जो नहीं जानते वफ़ा क्या है

 

बुलबुल के कारोबार पे हैं ख़ंदा-हा-ए-गुल
कहते हैं जिस को इश्क़ ख़लल है दिमाग़ का
ख़ंदा-हा-ए-गुल  =   फूलों की हंसी

‘ग़ालिब’ बुरा न मान जो वाइज़* बुरा कहे
ऐसा भी कोई है कि सब अच्छा कहें जिसे

 

हाए उस चार गिरह कपड़े की क़िस्मत ‘ग़ालिब’
जिस की क़िस्मत में हो आशिक़ का गिरेबाँ होना

 

हैं और भी दुनिया में सुख़न-वर बहुत अच्छे
कहते हैं कि ‘ग़ालिब’ का है अंदाज़-ए-बयाँ और

 

बुलबुल के कारोबार पे हैं ख़ंदा-हा-ए-गुल
कहते हैं जिस को इश्क़ ख़लल है दिमाग़ का
ख़ंदा-हा-ए-गुल  =   फूलों की हंसी

दिल दिया जान के क्यों उसको वफादार “असद” 
ग़लती की के जो काफिर को मुस्लमान समझा

 

खुदा के वास्ते पर्दा न रुख्सार से उठा ज़ालिम 
कहीं ऐसा न हो जहाँ भी वही काफिर सनम निकले..

 

फिर उसी बेवफा पे मरते हैं 
फिर वही ज़िन्दगी हमारी है 
बेखुदी बेसबब नहीं ‘ग़ालिब’
कुछ तो है जिस की पर्दादारी है

 

यह जो हम हिज्र में दीवार-ओ -दर को देखते हैं 
कभी सबा को कभी नामाबर को देखते हैं

वो आये घर में  हमारे , खुदा की कुदरत है 
कभी हम उन को कभी अपने घर को देखते हैं

नज़र लगे न कहीं उसके दस्त-ओ -बाज़ू को 
ये लोग क्यों मेरे ज़ख्म-ऐ -जिगर को देखते हैं

तेरे जवाहीर-ऐ- तरफ ऐ-कुलाह को क्या देखें 
हम ओज-ऐ-ताला- ऐ-लाल-ओ-गुहार को देखते हैं

 

Ishq Par Zor Nahi Hai Yeh Woh Aatish ‘Ghalib’;
Ki Lagaye Na Lage Aur Bujhaye Na Bujhe!

Jaate Hue Kehte Ho Qayamat Ko Milenge;
Kya Khoob Qayamat Ka Hai Goya Koi Din Aur!

Mohabbat Mein Nahi Hai Farq Jeene Aur Marne Ka;
Usi Ko Dekh Kar Jeete Hain Jis Kafir Pe Dam Nikle!

 

Daag-e-Dil Se Bhi Roshni Na Mili;
Ye Diya Bhi Jala Ke Dekh Liya!

 

Dil Se Mitna Tiri Agusht-e-Hinaai Ka Khyaal;
Ho Geya Gosht Se Naakhun Ka Judaa Ho Jaana!

 

Etibar-e-Ishq Kee Khana-Kharaabi Dekhna;
Gair Ne Kee Aah Lekin Vo Khafaa Mujh Par Hue!

 

Mohabbat Mein Nahi Hai Farq Jeene Aur Marne Ka;
Usi Ko Dekh Kar Jeete Hain Jis Kafir Pe Dum Nikle!

 

Aata Hai Kaun Kaun Tere Gham Ko Baantne
Ghalib Tu Apni Maut Ki Afwaah Udaa Ke Dekh

Main Aur Bazm-E-Mai Se Yun Tishna-Kaam Aaun
Gar Maine Kee Thi Tauba Saaqi Ko Kyaa Hua Tha

Giri Is Tabassum Ki Bijali Ajal Par
Andhere Ka Ho Noor Mein Kya Guzara

Justjoo Jis Gul Ki Tarpati Thi Ai Bulbul Mujhe
Khoobi-e-Qismat Se Aakhir Mil Gaya Woh Gul Mujhe

Parwana Tujhse Karta Hai Ai Shama Pyaar Kyon
Ye Jaane Beqaraar Hai Tujh Par Nisar Kyon

Qismat Buri Sahi Par Tabiyat Buri Nahin
Hai Shukr Ki Jagah Ki Shikayat Nahin Mujhe

Zulm Hai Gar Na Do Sakun Ki Daad
Qahar Hai Gar Karona Mujhko Pyaar

Hoga Koi Aisa Bhi Ki Ghalib Ko Na Jaane
Shayar Toh Wah Achchha Hai Par Badnaam Bahut Hai

 

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