Read and listen Munawwar Rana Maa poetry in hindi

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Poet Introduction:


Munawwar Rana is a popular Hindi and Urdu poet in India.

He was born in the sleepy town of Rae Bareli in Uttar Pradesh in 1952

Here we are representing “Munawwar Rana Maa poetry in hindi“.


उदास रहने को अच्छा नहीं बताता हैं
कोई भी जहर को मीठा नहीं बताता हैं,
कल अपने आप को देखा था माँ की आँखों में
ये आईना हमें बूढा नहीं बताता हैं !

ए अँधेरे देख ले मुह तेरा काल हो गया ,
माँ ने आँखें खोल दी घर में उजाला हो गया !

इस तरह मेरे गुनाहों को वो धो देती हैं ,
माँ बहुत गुस्से में होती हैं तो रो देती हैं !


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लबो पर उसके कभी बद्दुआ नहीं होती ,
बस एक माँ हैं जो कभी खफा नहीं होती !

मैंने रोते हुए पोंछे थे किसी दिन आंसू ,
मुद्दतों माँ ने नहीं धोया दुपट्टा अपना !

अभी ज़िंदा हैं माँ मेरी मुझे कुछ भी नहीं होगा ,
मैं जब घर से निकलता हूँ दुआ भी साथ चलती हैं ,

जब भी कश्ती मेरी सैलाब में आ जाती हैं ,
माँ दुआ करती हुई ख्वाब में आ जाती हैं !

बुलंदियों का बड़े से बड़ा निशान छुआ ,
उठाया गोद में माँ ने , तब आसमान छुआ !

किसी को घर मिला हिस्से में ,या कोई दुकाँ आई
मैं घर में सबसे छोटा था ,मेरे हिस्से में माँ आई !


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बुलंदी किस सख़्श के हिस्से में रहती हैं,
बहुत ऊँची ईमारत हर घढ़ी खतरे में रहती हैं,
बहुत जी चाहता हैं कैद- ऐ – जां से हम निकल जाये ,
तुम्हारी याद भी लेकिन इसी मलबे में रहती हैं

ये ऐसा क़र्ज़ हैं जो मैं अदा कर ही नहीं सकता ,
मैं जब तक घर न लौटू, मेरी माँ सजदे में रहती हैं !

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मेरी ख्वाहिश हैं की मैं फिर से फरिश्ता हो जाऊं ,
माँ से इस तरह लिपटू की बच्चा हो जाऊं ,
कम से कम बच्चो की हंसी की खातिर ,
ऐसी मिटटी में मिलाना की खिलौना हो जाऊं !

मुझको हर हाल में बख्छेगा उजाला अपना,
चाँद रिश्ते में नहीं लगता हैं मामा अपना ,
मैने रोते हुए पोंछे थे किसी दिन आंसू ,
मुद्द्तों माँ ने नहीं धोया दुपट्टा अपना !

उम्र भर खाली यू ही मैनें अपना मका रहने दिया,
तुम गए तो कभी दूसरे हो न रहने दिया ,
मैने कल शब चाहतो की सब किताबे फाड़ दी ,
बस एक कागज़ पर लिखा शब्द “माँ” रहने दिया !


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मुख़्तसर होते हुए भी जिंदगी बढ़ जाएगी ,
माँ की आँखे चूम लीजिये रोशनी बढ़ जाएगी!

यूँ तो उसको सुझाई नहीं देता लेकिन ,
माँ अभी तक मेरे चहरे को पढ़ा करती हैं,
माँ की सब खूबिया बेटियों में चली आयीं हैं ,
मैं तो सो जाता हूँ मगर वो जगा करती हैं !

माँ कि आगे यूँ कभी खुलकर नहीं रोना ,
जहाँ बुनियाद हो इतनी नमी अच्छी नहीं होती !

लिपट जाता हूँ माँ से और मौसी मुस्कुराती हैं ,
मैं उद्रू में ग़ज़ल कहता हूँ हिंदी मुस्कराती हैं,
उछलते खेलते बचपन में बेटा ढूंढती होगी ,
तभी तो पोते को देखकर दादी मुस्कुराती हैं !


Listen these lines: (Munawwar Rana Maa poetry in hindi)



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