Read best munawwar rana shayari in hindi


तुम्हारी महफिलों में हम बड़े बूढ़े जरूरी हैं,
अगर हम ही नहीं होंगे तो पगड़ी कौन बांधेगा !

सेहरा पे बुरा वक़्त मेरे यार पड़ा है,
दीवाना कई रोज़ से बीमार पड़ा है !

काले कपड़े नहीं पहने हैं तो इतना कर ले
इक ज़रा देर को कमरे में अँधेरा कर ले

मैंने कल शब चाहतों की सब किताबें फाड़ दीं,
सिर्फ़ इक काग़ज़ पे लिक्खा लफ़्ज़ माँ रहने दिया !

अब अँधेरा मुस्तक़िल रहता है इस देहलीज़ पर,
जो हमारी मुन्तज़िर रहती थी आँखें बुझ गईं |

माँ शायद इतने साल तक इसलिए जीवित रहीं क्योंकि मैं उन्हें धमकाता रहता था
तुम चली गई तो तुम्हारे पीछे-पीछे मैं भी चला आऊंगा।

मियाँ मैं शेर हूँ ,शेरों की गुर्राहट नहीं जाती
मैं लहजा नर्म भी कर लूँ तो झुंझलाहट नहीं जाती
मैं एक दिन बेख्याली में कहीं सच बोल बैठा था
मैं कोशिश कर चुका हूँ ,मुंह की कड़वाहट नहीं जाती

ग़ज़ल और शायरी की सल्तनत पर आज भी क़ब्ज़ा हमारा है

इसलिए तो हम अपने नाम के आगे अभी राना लगाते हैं
ख़ुद अपने आपको शादाब करना चाहता है,
ये कलम का फ़क़ीर आपको आदाब करना चाहता है !

एक हालत पर न रहने पायी दिल की हसरते,
तुमने जब देखा नए अंदाज से देखा मुझे,

यह तो ठीक है तेरी जफ़ा भी है एक अता मेरे वास्ते,
मेरी दुआओं की कसम तुझे, कभी मुस्कुरा के भी देख ले.
हाय वो दौरे ज़िन्दगी, जिसका लक़ब शबाब था,
कैसी लतीफ़ नींद थी, कैसा हसीं ख़्वाब था

उसकी रफ़्तार है बस मोजा-इ-कोसर की तरह,
गुफ्तगू में है कनक शीशा-ओह-सागर की तरह

मेरी नेकियाँ गिनने की नौबत ही नहीं आएंगी,
मैंने जो माँ पे लिखा है वही काफ़ी होगा

सारे हवा में घोल दी है नफरतें और हवास अहल ए सियासत ने
मगर न जाने क्यों पानी कुँए का आज तक मीठा निकलता है
ये जो कलम दवात लिये कंधों पे फिरा करते हैं,
मर भी जाएं तो भी शायर नही होने वाले..!

गाँव की कच्ची मिटटी का समझ के बेच न देना इस घर को
शायद ये कभी सर और अबरुर को छुपाने के काम आए
इन गाव की घोर अँधेरी रात में अक्सर सुनहरी मशालें लेकर
मासूम परिन्दों की मुसीबत का पता ये जुगनू लगाते हैं


उम्मीद भी किरदार पे पूरी नहीं उतरी
ये शब दिले-बीमार पे पूरी नहीं उतरी

क्या ख़ौफ़ का मंज़र था तेरे शहर में कल रात
सच्चाई भी अख़बार में पूरी नहीं उतरी

तस्वीर में एक रंग अभी छूट रहा है
शोख़ी अभी रुख़सार पे पूरी नहीं उतरी

पर उसके कहीं,जिस्म कहीं, ख़ुद वो कहीं है
चिड़िया कभी मीनार पे पूरी नहीं उतरी

एक तेरे न रहने से बदल जाता है सब कुछ
कल धूप भी दीवार पे पूरी नहीं उतरी

मैं दुनिया के मेयार पे पूरा नहीं उतरा
दुनिया मेरे मेयार पे पूरी नहीं उतरी


जब कभी धूप की शिद्दत ने सताया मुझको
याद आया बहुत एक पेड़ का साया मुझको

अब भी रौशन है तेरी याद से घर के कमरे
रोशनी देता है अब तक तेरा साया मुझको

मेरी ख़्वाहिश थी की मैं रौशनी बाँटू सबको
जिंदगी तूने बहुत जल्द बुझाया मुझको

चाहने वालों ने कोशिश तो बहुत की लेकिन
खो गया मैं तो कोई ढूँढ न पाया मुझको

सख़्त हैरत में पड़ी मौत ये जुमला सुनकर
आ, अदा करना है साँसों का किराया मुझको

शुक्रिया तेरा अदा करता हूँ जाते-जाते
जिंदगी तूने बहुत रोज़ बचाया मुझको


ना जन्नत मैंने देखी है ना जन्नत की तवक्क़ो है
मगर मैं ख़्वाब में इस मुल्क का नक़शा बनाता हूँ

मुझे अपनी वफ़ादारी पे कोई शक नहीं होता
मैं खून-ए-दिल मिला देता हूँ जब झंडा बनाता हूँ


कभी शहरों से गुज़रेंगे कभी सेहरा भी देखेंगे,
हम इस दुनिया में आएं हैं तो ये मेला भी देखेंगे ।

तेरे अश्कों की तेरे शहर में क़ीमत नहीं लेकिन,
तड़प जाएंगे घर वाले जो एक क़तरा भी देखेंगे ।

मेरे वापस ना आने पर बहुत से लोग ख़ुश होंगे,
मगर कुछ लोग मेरा उम्र भर रस्ता भी देखेंगे ।


ये दरवेशों कि बस्ती है यहाँ ऐसा नहीं होगा,
लिबास-ए-ज़िन्दगी फट जाएगा मैला नहीं होगा !

शेयर बाज़ार की क़ीमत उछलती गिरती रहती है,
मगर ये खून-ए-मुफ़लिस है कभी महंगा नहीं होगा !


परदेस जाने वाले कभी लौट आएँगे,
लेकिन इस इन्तिज़ार में आँखें चली गईं

वहां आसाइशें कम थीं तमन्नाएं ज़ियादा थीं,
यहाँ पर तेल नो मन है तो राधा छोड़ आएं हैं !

ज़रा सी बात है लेकिन हवा को कौन समझाए,
दिये से मेरी माँ मेरे लिए काजल बनाती है !

ग़रीबों पर तो मौसम भी हुकूमत करते रहते हैं,
कभी बारिश, कभी गर्मी, कभी ठंडक का क़ब्ज़ा है !

ज़मीं-ए-नानक-ओ-चिश्ती, ज़बान-ए-ग़ालिब-ओ-तुलसी,
ये सब कुछ पास था अपने, ये सारा छोड़ आए हैं !


मुहाजिर हैं मगर हम एक दुनिया छोड़ आए हैं
तुम्हारे पास जितना है हम उतना छोड़ आए हैं

कहानी का ये हिस्सा आजतक सब से छुपाया है
कि हम मिट्टी की ख़ातिर अपना सोना छोड़ आए हैं

नई दुनिया बसा लेने की इक कमज़ोर चाहत में
पुराने घर की दहलीज़ों को सूना छोड़ आए हैं

अक़ीदत से कलाई पर जो इक बच्ची ने बाँधी थी
वो राखी छोड़ आए हैं वो रिश्ता छोड़ आए हैं

किसी की आरज़ू के पाँवों में ज़ंजीर डाली थी
किसी की ऊन की तीली में फंदा छोड़ आए हैं

पकाकर रोटियाँ रखती थी माँ जिसमें सलीक़े से
निकलते वक़्त वो रोटी की डलिया छोड़ आए हैं

जो इक पतली सड़क उन्नाव से मोहान जाती है
वहीं हसरत के ख़्वाबों को भटकता छोड़ आए हैं

यक़ीं आता नहीं, लगता है कच्ची नींद में शायद
हम अपना घर गली अपना मोहल्ला छोड़ आए हैं

हमारे लौट आने की दुआएँ करता रहता है
हम अपनी छत पे जो चिड़ियों का जत्था छोड़ आए हैं

हमें हिजरत की इस अन्धी गुफ़ा में याद आता है
अजन्ता छोड़ आए हैं एलोरा छोड़ आए हैं

सभी त्योहार मिलजुल कर मनाते थे वहाँ जब थे
दिवाली छोड़ आए हैं दशहरा छोड़ आए हैं

हमें सूरज की किरनें इस लिए तक़लीफ़ देती हैं
अवध की शाम काशी का सवेरा छोड़ आए हैं

गले मिलती हुई नदियाँ गले मिलते हुए मज़हब
इलाहाबाद में कैसा नज़ारा छोड़ आए हैं

हम अपने साथ तस्वीरें तो ले आए हैं शादी की
किसी शायर ने लिक्खा था जो सेहरा छोड़ आए हैं


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