mirza ghalib poetry in hindi

We are sharing some famous “mirza ghalib poetry in hindi” written by Mirza Ghalib


हर एक बात पे कहते हो तुम के ‘तो क्या हैं ’ ?
तुम्ही कहो के ऐ अंदाज़ -ऐ -गुफ्तगू क्या हैं ?
रग़ों मै दौड़ते फिरने के हम नहीं क़ायल ,
जब आँख ही से न टपका तो फिर लहू क्या हैं ?

सारी राह जो उनसे नज़र मिली ,
तो नक्श दिल के उभर गये ,
हम नज़र मिला कर झिझग गये ,
वह नज़र झुका कर चले गये !

सबने पहना था बड़े शौक से कागज़ का लिबास ,
जिस कदर लोग थे बारिश में नहाने वाले ,
अदल कि तुम न हमे आस दिलाओ ,
क़त्ल हो जाते हैं , ज़ंज़ीर हिलाने वाले !

वादे पे वो ऐतबार नहीं करते,
हम जिक्र मौहब्बत सरे बाजार नहीं करते,
डरता है दिल उनकी रुसवाई से,
और वो सोचते हैं हम उनसे प्यार नहीं करते |


इबने-मरियम हुआ करे कोई
मेरे दुख की दवा करे कोई

शरअ-ओ-आईन पर मदार सही
ऐसे कातिल का क्या करे कोई

चाल, जैसे कड़ी कमां का तीर
दिल में ऐसे के जा करे कोई

बात पर वां ज़बान कटती है
वो कहें और सुना करे कोई

बक रहा हूं जुनूं में क्या-क्या कुछ
कुछ न समझे ख़ुदा करे कोई

न सुनो गर बुरा कहे कोई
न कहो गर बुरा करे कोई

रोक लो, गर ग़लत चले कोई
बख़श दो गर ख़ता करे कोई

कौन है जो नहीं है हाजतमन्द
किसकी हाजत रवा करे कोई

क्या किया ख़िज्र ने सिकन्दर से
अब किसे रहनुमा करे कोई

जब तवक्को ही उठ गयी ‘ग़ालिब’
कयों किसी का गिला करे कोई


कब वो सुनता है कहानी मेरी
और फिर वो भी ज़बानी मेरी

ख़लिश-ए-ग़मज़ा-ए-खूंरेज़ न पूछ
देख ख़ून्नाबा-फ़िशानी मेरी

क्या बयां करके मेरा रोएंगे यार
मगर आशुफ़ता-बयानी मेरी

हूं ज़-ख़ुद रफ़ता-ए-बैदा-ए-ख़याल
भूल जाना है निशानी मेरी

मुतकाबिल है मुकाबिल मेरा
रुक गया देख रवानी मेरी

कद्रे-संगे-सरे-रह रखता हूं
सख़त-अरज़ां है गिरानी मेरी

गरद-बाद-ए-रहे-बेताबी हूं
सरसरे-शौक है बानी मेरी

दहन उसका जो न मालूम हुआ
खुल गयी हेच मदानी मेरी

कर दिया ज़ोफ़ ने आज़िज़ ‘ग़ालिब’
नंग-ए-पीरी है जवानी मेरी

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